Uttar Da Puttar Movie Review: Agar aap Annu Kapoor ki nai family comedy dekhne ka plan bana rahe hain to is review me story, cast, rating aur final verdict sab kuch milega.
🎬Uttar Da Puttar Movie Review Information
Uttar Da Puttar (उत्तर दा पुत्तर)
✦ Social Satire ✦ Comedy-Drama ✦
📖 Uttar Da Puttar Movie Review Story
ये कहानी है प्रोफेसर साईं राम तुतेजा (अन्नू कपूर) की, जो एक फिजिक्स के प्रोफेसर हैं। वो अपने स्टूडेंट्स को फिजिक्स के जटिल सिद्धांत पढ़ाते हैं, लेकिन अपनी निजी जिंदगी में वास्तु शास्त्र और ज्योतिष के दीवाने हैं। उन्हें वास्तु पर इतना भरोसा है कि वो हर फैसला—घर चुनने से लेकर रूटीन प्लान करने तक—वास्तु के हिसाब से लेते हैं। यहाँ तक कि वो टॉयलेट जाते समय भी उत्तर दिशा (North) की तरफ मुंह करके बैठते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इससे पॉजिटिव एनर्जी आती है।
कहानी तब शुरू होती है जब उनकी प्रेग्नेंट पत्नी गिन्नी (रुखसार रहमान) उन्हें अल्टीमेटम देती है—बच्चे के पैदा होने से पहले उनके पास अपना घर होना चाहिए, किराए का नहीं। ये बात प्रोफेसर तुतेजा को एक मिशन पर ले जाती है—दिल्ली में वास्तु-अनुकूल, उत्तर-मुखी (North-Facing) घर ढूंढना। इस सफर में उनका दोस्त मन्नू (बृजेंद्र काला) साथ होता है, जो एक ट्रैवल एजेंट है और उनका ज्योतिषी भी है।
लेकिन “परफेक्ट” घर की तलाश में उन्हें कई मजेदार और अजीबोगरीब किरदारों से सामना होता है—भ्रष्ट एमसीडी ऑफिसर, एक दिव्यांग आर्किटेक्ट, सड़क पर रहने वाले ठग, और तेजतर्रार पंजाबी गुंडे। मजा तब आता है जब उनके “परफेक्ट” घर में एक पुराना सीलिंग फैन गिर जाता है और उनके ससुर और साले को चोट आ जाती है। इस घटना से गुस्साई पत्नी उन्हें छोड़कर चली जाती है। अब साईं राम को अपनी पत्नी को वापस जीतने और अपनी मान्यताओं को हकीकत से मिलाने का रास्ता खोजना है।
फिल्म बड़ी चतुराई से विज्ञान और अंधविश्वास, लॉजिक और आँख बंद करके विश्वास के बीच के टकराव को दिखाती है—बिना उपदेश दिए। ये सवाल उठाती है: क्या जिंदगी करम से बनती है या किस्मत से? मजेदार सिचुएशन और भरोसेमंद किरदारों के जरिए फिल्म बताती है कि मान्यताएं और रिवाज भले ही सुकून देते हों, असली बदलाव आपके अंदर से और आपके कर्मों से आता है।
🎭Uttar Da Puttar Movie Review Cast
इस फिल्म की सारी जिम्मेदारी हिंदी सिनेमा के कुछ सबसे भरोसेमंद कैरेक्टर एक्टर्स के कंधों पर है, और उन्होंने शानदार प्रदर्शन दिया है।
अन्नू कपूर (प्रोफेसर साईं राम तुतेजा):
अन्नू कपूर इस फिल्म की जान हैं। उन्होंने अपने करियर के सबसे मनोरंजक प्रदर्शनों में से एक दिया है। वो अपने किरदार के विरोधाभासों—एक फिजिक्स प्रोफेसर जो वास्तु और ज्योतिष में यकीन रखता है—को बखूबी संभालते हैं। उनकी कॉमेडी टाइमिंग बेजोड़ है और वो हंसी से भावुक सीन्स तक आसानी से संक्रमण कर लेते हैं। ये परफॉर्मेंस तुरंत उनके विकी डोनर और जॉली एलएलबी 2 जैसी फिल्मों के यादगार काम की याद दिलाती है, जो साबित करता है कि वो भारतीय सिनेमा के बेहतरीन कैरेक्टर एक्टर्स में से एक क्यों हैं। एक सीन में वो रात को शराब पीते हुए सितारों से बात करते हैं और एक डायलॉग कहते हैं जो दिल को छू लेता है: “ओ तारों, क्यों तुम मेरी किस्मत पर ताला मार कर बैठे हो…”
बृजेंद्र काला (मन्नू):
बृजेंद्र काला ने साईं राम के वफादार दोस्त के रूप में शानदार काम किया है। अन्नू कपूर के साथ उनकी केमिस्ट्री फिल्म के सबसे मजेदार पलों को जन्म देती है। उनका नेचुरल डायलॉग डिलीवरी कहानी को गर्माहट देता है। उनका आसान स्वभाव साईं राम के जिद्दी स्वभाव को पूरी तरह से कंप्लीमेंट करता है।
रुखसार रहमान (गिन्नी):
पत्नी गिन्नी के किरदार में रुखसार रहमान ने गर्मजोशी और ईमानदारी भरी है। उन्होंने अपनी निराशा को भरोसेमंद बनाया है और कहानी में भावनात्मक संतुलन प्रदान किया है, जो साईं राम की मान्यताओं के बीच कहानी को जमीन से जोड़े रखता है।
पवन मल्होत्रा (नेक चड्ढा):
पवन मल्होत्रा ने हमेशा की तरह एक लालची एमसीडी ऑफिसर के रूप में गहरी छाप छोड़ी है। उनका किरदार कहानी में मजेदारी और अप्रत्याशितता की एक और परत जोड़ता है। जब भी वो स्क्रीन पर आते हैं, नई हंसी लेकर आते हैं।
इश्तियाक खान (आर्किटेक्ट वर्मा):
इश्तियाक खान एक दिव्यांग आर्किटेक्ट के रूप में फिल्म के सबसे मजेदार सरप्राइज के रूप में उभरे हैं। कम स्क्रीन टाइम होने के बावजूद, उनकी मौजूदगी ही हंसी लाती है और आप चाहते हैं कि उन्हें और स्क्रीन टाइम मिलता।
अन्य सहायक कलाकार:
जीवेशु अहलुवालिया और सुमित गुलाटी ने अपने-अपने किरदारों में विश्वसनीय प्रदर्शन किया है। नितिन अरोड़ा और राजेंद्र सेठी ने भी प्रभावी योगदान दिया है।
कुल मिलाकर, इस पूरी टीम की बेहतरीन केमिस्ट्री फिल्म को लगातार रोचक बनाती है और अनुभव को बेहतर बनाती है।
🎥 Uttar Da Puttar Movie Review Direction
रविंदर सिवाच ने उत्तर दा पुत्तर के साथ एक शानदार डेब्यू किया है। उन्होंने एक फिल्मकार के रूप में उल्लेखनीय आत्मविश्वास दिखाया है—उन्होंने पहले कुछ मिनटों में ही केंद्रीय संघर्ष स्थापित कर दिया है और पूरी फिल्म में जीवंत गति बनाए रखी है। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये है कि उन्होंने फिल्म को फोकस में रखा और मैसेज को ओवरकंप्लिकेट नहीं किया। वो समझते हैं कि कहानी ही काफी है और अनावश्यक उप-कथाएं नहीं डाली हैं।
लेखन की उत्कृष्टता:
संदीप कपूर और रविंदर सिवाच द्वारा लिखी गई कहानी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। पटकथा प्रामाणिक लगती है, जिसमें किरदार भरोसेमंद हैं और सिचुएशन रोजमर्रा की जिंदगी से निकले हैं। लेखकों ने पटकथा में परिचित दिल्ली के किरदार, रोजमर्रा के हालात और रिलेटेबल ह्यूमर भर दिया है। सबसे बड़ी नवीनता एक फिजिक्स प्रोफेसर को दिखाना है जो आँख बंद करके वास्तु में विश्वास करता है—एक असामान्य विरोधाभास जिसे सिवाच ने विश्वसनीय ढंग से पेश किया है, कॉमेडी और ड्रामा को बिना भावनात्मक गहराई खोए संतुलित किया है।
संवाद और ह्यूमर:
संवाद मजेदार और रिलेटेबल हैं, हालांकि कुछ जगहों पर हल्के लग सकते हैं। ज्यादातर हंसी सिचुएशन और किरदारों के अनोखे स्वभाव से निकलती है, न कि फोर्स्ड कॉमेडी या स्लैपस्टिक पर निर्भर होकर। फिल्म शेक्सपियर के जूलियस सीज़र की मशहूर लाइन—“द फॉल्ट, डियर ब्रूटस, इज नॉट इन आवर स्टार्स, बट इन आवरसेल्व्स”—का भी इस्तेमाल करती है, जो फिल्म के केंद्रीय थीम को पूरी तरह से पकड़ती है।
दिल्ली का माहौल:
फिल्म ने शहरी दिल्ली की रोजमर्रा की उथल-पुथल को प्रभावी ढंग से कैद किया है, शहर को प्रतीकात्मक रूप से इस्तेमाल करके भावनात्मक प्रभाव को मजबूत किया है। प्रामाणिक लोकेशंस फिल्म को एक असली, जीवंत अनुभव देती हैं जिसे दिल्ली के दर्शक तुरंत पहचानेंगे।
🎵Uttar Da Puttar Movie Review Music
उत्तर दा पुत्तर के संगीत को मिली-जुली प्रतिक्रिया मिली है। हालांकि संगीत कहानी की सेवा करता है और उसे आगे बढ़ाने में मदद करता है, लेकिन गाने क्रेडिट रोल के बाद कोई स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ते हैं। टाइटल ट्रैक, जो अंतराल पर आता है, फिल्म के आकर्षण को बढ़ाता है। हालांकि, रोहित शर्मा का बैकग्राउंड म्यूजिक कभी-कभी जरूरत से ज्यादा तेज हो जाता है और कुछ सीन्स में थोड़ा अत्यधिक लगता है, जिससे फिल्म का नेचुरल आकर्षण कम हो जाता है जो बाकी जगहों पर बना रहता है।
✅ सकारात्मक पहलू
1. परफेक्ट फैमिली एंटरटेनर:
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत ये है कि ये एक साफ-सुथरा फैमिली एंटरटेनर है। ऐसा कोई सीन नहीं है जो आपको परिवार के साथ देखने में असहज कर दे। ह्यूमर क्लीन है, जिसमें डबल-मीनिंग डायलॉग या अश्लीलता से बचा गया है।
2. दिल को छू लेने वाले प्रदर्शन:
अन्नू कपूर ने बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है जो उनके सबसे अच्छे काम की याद दिलाती है। बृजेंद्र काला, पवन मल्होत्रा और इश्तियाक खान सहित पूरी टीम की बेहतरीन केमिस्ट्री यादगार प्रदर्शन देती है।
3. ऑर्गेनिक ह्यूमर:
कॉमेडी सिचुएशन और किरदारों से निकलती है न कि थोपी गई है। ह्यूमर सिचुएशनल और रिलेटेबल है, जो फिल्म को पूरा रोचक बनाता है।
4. रिलेटेबल स्टोरी:
वास्तु शास्त्र, अंधविश्वास और मेट्रो सिटी में अपना घर खरीदने के मिडिल-क्लास सपने की पड़ताल बहुत रिलेटेबल है। जिसने भी मेट्रो सिटी में घर खरीदा है, रिनोवेट किया है, या कोशिश की है, वो तुरंत किरदारों और सिचुएशन से कनेक्ट हो जाएगा।
5. कॉमेडी और सोशल मैसेज के बीच संतुलन:
फिल्म अंधविश्वास और आँख बंद करके विश्वास के बारे में एक सार्थक संदेश देने में सफल रही है—बिना उपदेशात्मक या उबाऊ हुए। ये कॉमेडी के जरिए अलग-अलग दृष्टिकोण पेश करती है और दर्शकों को अपने निष्कर्ष निकालने देती है।
6. क्रिस्प रनटाइम:
सिर्फ 1 घंटा 43 मिनट होने के कारण फिल्म कभी भी खिंची हुई नहीं लगती। ये पूरे समय एक स्थिर गति बनाए रखती है और सीधे मुद्दे पर आती है, जिससे ये देखने में आसान हो जाती है।
❌ नकारात्मक पहलू
1. अंदाज़ा लगाने योग्य कहानी:
पटकथा कभी-कभी अंदाज़ा लगाने योग्य हो जाती है। फिल्म शायद ही दर्शकों को चौंकाती है और शुरू से अंत तक एक पारंपरिक रास्ते पर चलती है। कहानी थोड़ी सुरक्षित खेलती है, और कुछ मजबूत भावनात्मक पल या अप्रत्याशित ट्विस्ट अनुभव को और ऊंचा उठा सकते थे।
2. कमजोर संगीत:
संगीत सबसे कमजोर विभाग है। कोई भी गाना स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ता है, और बैकग्राउंड म्यूजिक अधिक प्रभावी हो सकता था। संगीत कहानी की सेवा करता है लेकिन उसे ऊंचा नहीं उठाता।
3. कुछ किरदार कम इस्तेमाल हुए:
हालांकि कलाकार मजबूत हैं, लेकिन सुमित गुलाटी (ज्ञान चंद) और जीवेशु अहलुवालिया (पंजाबी गुंडा) जैसे कुछ किरदार कम इस्तेमाल हुए हैं। स्क्रिप्ट में इन किरदारों और पूरी टीम से कहीं ज्यादा ह्यूमर निकालने की गुंजाइश थी। इसके अलावा, इश्तियाक खान का किरदार, फिल्म का सबसे मजेदार सरप्राइज होने के बावजूद, कम सीन्स में नजर आता है।
4. उम्र की असंगति:
कुछ दर्शकों को अन्नू कपूर की उम्र के आदमी को स्क्रीन पर ससुर द्वारा “बेटा” कहा जाना थोड़ा अजीब लगता है।
5. सुविधाजनक अंत:
फिल्म का क्लाइमैक्स थोड़ा सुविधाजनक और जल्दबाजी में लगता है, जो कुछ दर्शकों को और चाहने पर मजबूर कर सकता है।
🏆 Uttar Da Puttar Movie Review Verdict
उत्तर दा पुत्तर एक गर्मजोशी भरी, मजेदार और पूरी तरह से मनोरंजक स्लाइस-ऑफ-लाइफ कॉमेडी है जो खोसला का घोसला और विकी डोनर जैसी क्लासिक बॉलीवुड फैमिली एंटरटेनर्स की याद दिलाती है।
फिल्म का रिलेटेबल विषय, दिल को छू लेने वाले प्रदर्शन और जमीन से जुड़ा ह्यूमर इसे जुड़ने में आसान बनाता है। हालांकि पटकथा कभी-कभी जरूरत से ज्यादा जटिल हो जाती है, लेकिन इसकी गर्मजोशी, चतुराई और भावनात्मक ईमानदारी यह सुनिश्चित करती है कि ये लगातार मनोरंजक बनी रहे और सफर के लायक हो।
अन्नू कपूर ने एक बार फिर साबित कर दिया कि वो फिल्म की सबसे बड़ी ताकत क्यों हैं, कहानी को उल्लेखनीय आसानी से आगे बढ़ाते हैं। फिल्म अंधविश्वास का मजाक नहीं बनाती बल्कि धीरे से सुझाव देती है कि जहां वास्तु सद्भाव ला सकता है, वहीं असली बदलाव हमारे कर्मों और कार्यों से आता है—एक संतुलन जो समयबद्ध और सार्थक दोनों लगता है।
अगर आप एक हल्की-फुल्की फैमिली एंटरटेनर देख रहे हैं जो तेज कॉमेडी या अनावश्यक अश्लीलता पर निर्भर हुए बिना हंसी देती है, तो उत्तर दा पुत्तर निश्चित रूप से आपके समय के लायक है।
स्टार रेटिंग: ⭐⭐⭐½ (3.5/5)
❓Uttar Da Puttar Movie Review FAQs
प्रश्न 1: क्या उत्तर दा पुत्तर एक फैमिली-फ्रेंडली फिल्म है?
हाँ, ये एक साफ-सुथरा फैमिली एंटरटेनर है। इसमें कोई अश्लीलता, डबल-मीनिंग डायलॉग या असहज करने वाले सीन नहीं हैं। आप इसे अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं।
प्रश्न 2: फिल्म का रनटाइम कितना है?
फिल्म का रनटाइम 1 घंटा 43 मिनट (103 मिनट) है, जो काफी क्रिस्प है।
प्रश्न 3: क्या फिल्म किसी सच्ची कहानी पर आधारित है?
नहीं, उत्तर दा पुत्तर एक काल्पनिक कहानी है। हालांकि, यह वास्तु शास्त्र और ज्योतिष में आम विश्वास से प्रेरित है जो कई भारतीय परिवारों में मौजूद है।
प्रश्न 4: क्या फिल्म अंधविश्वास को बढ़ावा देती है?
नहीं। फिल्म एक फिजिक्स प्रोफेसर के अंधविश्वास में विश्वास की विडंबना को उजागर करने के लिए ह्यूमर का इस्तेमाल करती है। यह अलग-अलग दृष्टिकोण पेश करती है और दर्शकों को बिना आँख बंद करके विश्वास को बढ़ावा दिए अपने निष्कर्ष निकालने देती है।
प्रश्न 5: फिल्म का केंद्रीय विषय क्या है?
फिल्म इस पुराने सवाल की पड़ताल करती है: “करम बड़े या किस्मत?” (क्या करियर बड़ा है या किस्मत?) यह सुझाव देती है कि जहां मान्यताएं और रिवाज सुकून दे सकते हैं, वहीं असली बदलाव आपके कर्मों और प्रयासों से आता है।
प्रश्न 6: फिल्म कहाँ शूट की गई थी?
फिल्म दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में शूट की गई थी, जिनमें कुतुब मीनार, करोल बाग का 108-फुट हनुमान मंदिर, कनॉट प्लेस और इंडिया गेट शामिल हैं।
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